Meditation

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Credits: unsplash.com/@awesome

Despaired,
I gazed into my soul.
Alas!
I was looking into a hole.

Frightened,
I became from my own.
Happiness,
Was just a part, not the whole.

Hope,
Was no where to be found.
Darkness,
Seemed limitless, knew no bounds.

A voice,
Seemed to come from inside.
That voice,
Asked me to follow from behind.

*

Breathing,
As slow as a Predator hunting.
Posture,
As straight as a gazelle running.

Agitated,
I felt often, ‘those’ thoughts were returning.
Relax!
That voice said, as I resumed meditating.

Anxious,
I felt less, as I continued the practice.
Joy,
I felt more, mind away from all the malice.

Peace,
looked in reach, nothing more to worry.
Tranquil,
became life. No expectations, no hurry.

Darkness,
Was no where to be found.
Hope,
Seemed limitless, knew no bounds.

-हर्ष पटेल (Harsh Patel)

Reflections.

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Credits: Martin Sattler (unsplash.com)

I wonder how time seemed to crawl like a caterpillar,
Only to fly away later in my memories like a butterfly.

No wonder all the castles I had built in my dreams,
Seem to crumble away under their own weight in the sands of time.

They were stunned by the façade of that monument,
The foundations did their work, keeping quiet all the time.

Sleepless nights I had spent, weighing all my opinions and options,
Mistakes made me better, they were the best teachers everytime.

Being alone, I realised how far I had left myself behind,
My conscience was the bewildered passenger, I was the reckless driver all the time.

Lost in his own caccoon of thoughts, narcissm often got better of him,
Being at peace with oneself, he questioned his misplaced ego everytime.

Life is not a log book, nobody notes your rights and the crimes,
It is a colourful scrapbook, carrying only your joys and the delightful times.

-हर्ष पटेल।

हेक्टर

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My beloved ball of fur.

भूरी, थोड़ी सफ़ेद सी,
मोटी सी मटमैली सी,
चंचल चितवन पायी है,
हेक्टर हमारी प्यारी है।

फुदकती रहती यहाँ वहां,
चैन न मिलता किसी जगह,
दुपहरी घनी हो जाती है तो,
सो जाती मिले जहाँ छाँव घना।

मछली की है बड़ी दीवानी,
डब्बा खिसके, निकले वाणी,
म्याऊ म्याऊ से गुंजायमान कर देती,
जब तक न मिले खाना पानी।

कागज़ की गेंद दिखे नीचे,
घात लगाने में कर दे शेर को पीछे,
एक झपट्टा, मुँह में गेन्द,
हेक्टर के आगे सब है फेंट।

कहने को है दोनों पालतू,
पर कुत्ता- बिल्ली में अंतर अनेक,
एक इंसान को समझे खुदा,
दूसरा दिखाये नखरे अनेक।

इंसान भी इन चौपायो से,
सीखता कुछ चला जाता है।
वफ़ादारी ‘गर काबिलेतारीफ कुत्ते की,
तो बिल्लियों की मस्ती भी सीख जाता है।

-हर्ष पटेल।

मेरा शहर भोपाल

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The city of lakes- Bhopal.

ज़िन्दगी की कश्मकश में,
हर धूप में , हर बरसात में,
पाया मैंने सुकून,
अपने भोपाल की छाँव में।

समय बदलता रहा,
मंज़िलें बदलती गयी ,
नहीं बदला वो अपनापन,
मेरे भोपाल की छाँव में।

वो धुप में शाहपुरा की सैर ,
और तेज़ बरसातों के बाद
अप्पर लेक में उठती लहर,
बदलते रहे मौसम, कुछ नहीं बदला
तो वो थी खुशबू,
मेरे भोपाल की छाँव में।

यही मैंने न्यूटन के लॉ सीखे,
सीखा गणित के गुण- भाग,
यही सीखा मैंने क्रिकेट- फुटबॉल,
और क्यों हुए भारत के भाग।
कक्षा बदलता रहा, बदलती गयी मेरी किताबें,
न बदला 13 साल तो वो था स्कूल की बस का आना ,
मेरी भोपाल की छाँव में।

हिम से निकली पावन धरा समायी मेरे मात-पिता में,
कठिनाईयो के काले बादल से सुरक्षित रखा मेरे माँ बाप ने,
शब्दो की तारीफ़ काफी नहीं उनके लिए,
‘कल्पवृक्ष’ की तरह थे वो इस भोपाल की छाँव में।

लिखता चला जाऊंगा मैं अपने संसार के बारे में,
कभी आओ तो हम तुम्हे बताएँगे अपने इस ‘सपना-जहाँ’ के बारे में,
मेरी इस कविता को मेरा गुरूर मत समझना,
ये तो छोटी सी भेंट है उस स्वर्ग को, जो समाया था,
भोपाल की छाँव में।

-हर्ष पटेल।